आदिवासियों का अनूठा पर्व: भगोरिया

आदिवासियों का अनूठा पर्व: भगोरिया

(For English version, please see my next post)

मैं पश्चिमी मध्य प्रदेश के निमाड़ में 2002-03 में पदस्थ था। वहां की संस्कृति और रीति रिवाज ने मुझे काफी आकर्षित किया। उन्हीं में से एक है भगोरिया पर्व, उल्लास और प्रेम का उत्सव, जिसमें आदिवासी लोक संस्कृति के रंग बिखरते हैं।

कब और कहां
यह प्रति वर्ष होली के सात दिन पहले से हर दिन भिन्न भिन्न गांवों में आयोजित होता है। इसे मुख्यतः मध्य प्रदेश के खरगोन, बड़वानी, धार, झाबुआ और अलिराजपुर जिलों के भील और भिलाला आदिवासी मनाते हैं।

एक अनूठा मेला
एक ग्रामीण मेले की तरह मिठाई, नमकीन, कुल्फी, बर्फ के गोले, कपड़े, खिलौने, बर्तन, फल, सब्जी, गोदना इत्यादि के अलावा मनोरंजन के लिए झूले और खेल, सब कुछ मिलते हैं एक ही जगह।होलिका पूजन की सामग्री खरीदने के उद्देश्य से भी बड़ी संख्या में आदिवासी इन मेलों में आते हैं।

एक रंगारंग उत्सव
संगीत, नृत्य और रंगों से ओत-प्रोत इस मेले में आदिवासी युवक-युवतियां अपने पारंपरिक वेष-भूषा में सज-धज कर घूमती हैं। युवतियां चांदी के भारी आभूषण पहनती हैं और युवक बांसुरी लिए होते हैं। वे पारंपरिक ‘लहरी’ नृत्य करते भी दिख जाते हैं। आदिवासी हस्तशिल्प और कलाकृति के नमूने विशेषतया कपास और कपड़े से निर्मित गुड़िया विशेष आकर्षण होते है।

पर्व की उत्पत्ति
राजा भोज के कालखंड में दो भील राजाओं कासूमर और बालून ने अपनी राजधानी भगोर में इसकी शुरुआत की थी। इसलिए इसे भगोरिया कहते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि इस पर्व के प्रथम नायक-नायिका भाव और गौरी (शिव-पार्वती) थे। इसलिए भगोरिया नाम पड़ा।

प्रणय निवेदन और विवाह
भगोरिया का एक और शाब्दिक अर्थ होता है, भागना। इस पर्व के दौरान आदिवासी भील युवक अपनी पसंद की भील युवती से प्रणय निवेदन करता है। यदि युवती को स्वीकार्य होता है, तो दोनों सहमति से भाग जाते हैं और तब तक वापस नहीं आते, जब तक दोनों परिवार परस्पर सहमति से उनके विवाह के लिए राजी नहीं हो जाते।

प्रेम प्रस्ताव के रूप
जब किसी युवक को कोई युवती पसंद आती है, तो उसे वह रंग लगाता है या पान का बीड़ा देता है। युवती द्वारा पान खाने को उसकी स्वीकृति मानी जाती है। यदि लड़की प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती है, तो लड़के द्वारा कोई जोर जबरदस्ती नहीं की जाती है।

इस प्रणय प्रसंग को मैं ने स्वयं तो नहीं देखा, किंतु पान खाते युवक-युवतियों को साथ घूमते जरूर देखा। ये सामान्यतः झुंड बना कर घूमते हैं लड़कों की अलग, लड़कियों की अलग और दोनों के मिश्रित झुंड भी।

अब कुछ प्रगतिशील आदिवासी भाग कर शादी करने की बात या इसे वेलेंटाइन वीक नहीं मानते और ताड़ी सेवन जैसे व्याप्त व्यसन को ख़त्म कर अपने समाज में जन-जागृति लाना चाहते है, जो एक शुभ संकेत है।

किंतु भगोरिया आदिवासियों के उल्लास और लैंगिक समानता का अद्भुत सांस्कृतिक पर्व है, जो एक दूसरे को जानने समझने का अवसर देता है और भाई चारा बढ़ाने में मदद करता है। इसकी पवित्रता और भावना अक्षुण्ण रखनी चाहिए।

–कौशल किशोर

images:google

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