नियति- एक कहानी

(For English version please see my next post)

बिहार में अररिया जिले का बैरगाछी गांव अपनी रमणीक प्राकृतिक छटा से आगंतुकों का मन मुग्ध कर लेता था। मुख्य सड़क से गांव तक कच्ची सड़क के दोनों ओर आम, नीम, गुलमोहर, अमलतास, विलायती इमली, गुड़हल आदि वृक्ष और झाड़ियां मोहक सुरम्यता प्रदान करती थीं। खरीफ में मक्का और ज्वार तो रबी में गेहूं और चने की फसल से लहलहाते खेत बहुत ही मनोहारी लगते थे।

चांदनी रात चाहे जितनी शीतलता और कमनीयता प्रदान कर दे, चांद के धब्बे दिख ही जाते हैं। उसी मनोरम गांव में एक परिवार ऐसा भी था, जिन्हें उसी हरियाली के बीच रोज सबेरे से शाम तक मजदूरी करनी पड़ती थी। अपना पेट पालने के लिए उनके पास एक यही विकल्प था। नंदू रोज जाता था खेतों पर अपनी माई धनिया के साथ मजदूरी करने।

उसी गांव में बटुक सेठ थे, जिनकी अपनी एक दुकान थी किराने की। उनके पास बीस एकड़ खेत भी था, जिस पर वह अच्छी खेती करते थे। एक समय नंदू का बाप चेतराम और उसकी माई धनिया बटुक सेठ के खेत पर ही मजदूरी करते थे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि परिवार के ऊपर पहाड़ टूट पड़ा अचानक, जब एक दौर ऐसा भी बीच में आया, जब चेतराम का तपेदिक से निधन हो गया।

तब नंदू मात्र पांच साल का था। अब तो उसे अपने बाबू का चेहरा भी याद नहीं रहा। उसे क्या पता कि उसकी माई को क्या क्या पापड़ बेलने पड़े थे उसे और उसकी दो बहनों को पालने पोसने में। एक असहारा विधवा को कितनी विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, धनिया से अच्छा कौन जानता था।

सहानुभूति के उस दौर में गांव के बटुक सेठ ने, जिसकी कृपा दृष्टि धन्नो और चेतराम पर पहले भी थी, उसकी आर्थिक मदद अवश्य की थी कुछ पैसे देकर। लेकिन गुजारे के लिए पूर्ववत नियमित आय होनी चाहिए थी। सो बटुक सेठ ने धनिया को फिर अपने यहां काम पर रख लिया। दोनों के बीच कुछ नजदीकियां बढ़ी, तो गांव के लोग उसे कुत्सित नजर से देखने लगे थे।

विधवा होना ही अपने आप में अभिशाप था। अपने मर्द का न होना यदा कदा उसे कमजोर बना देता था। भांति भांति की बातें गली गलियारों में चलने लगी थी। कुछ लोग तो दबी जबान में यहां तक कहने लगे थे कि धन्नो की छोटी बेटी नैना का चेहरा बहुत कुछ बटुक सेठ से मिलता है।

बातें जब ज्यादा बढ़ीं, तो बटुक सेठ के घर में कलह होना प्रारंभ हो गया, जिसकी इतिश्री हुई धन्नो के काम से निकालने पर। धन्नो के लिए यह कठिनतम दौर था, जब खेत खेत एक खेतिहर मजदूर की तरह दिन दिन भर उसे काम करना पड़ता, फिर भी कमी रह जाती थी।

धन्नो गेहूं और धान की खेती अवश्य करती थी, किन्तु उसे न गेहूं की रोटी नसीब हो पाती थी न चावल। गेहूं के अभाव में वह लाल कोदो, जो प्रायः जानवरो और भिखारियों को दी जाती थी, के आटे से रोटी बना कर नून प्याज़ के साथ चारों का जैसे तैसे पेट भर पाती थी।

नंदू ने जब थोड़ा होश सम्हाला, तो वह भी अपनी माई के साथ खेतों पर मजदूरी करने लगा था। फिर नंदू की शादी हुई, दो बच्चे भी हुए, खर्च और बढ़ा, किन्तु उसकी पत्नी सिया घर और बच्चों को ही संभालती थी। घर में दीए की रोशनी मद्धिम पड़ती जाती है जब घर बड़ा होने लगता है या तेल कम होने लगता है।

मां बेटे की मजदूरी से घर का खर्चा मुश्किल से ही निकल पाता था। चूंकि पत्थर तोड़ने के काम में अच्छी मजदूरी मिल जाती थी, और पहाड़ भी था गांव से लगा हुआ, नंदू को वही ज्यादा भाने लगा था। हां, छाले जरूर पड़ जाते थे हाथों में। पर भूख की आग से पड़ने वाले छाले से ये छाले बेहतर थे।

नंदू को अपनी दोनों बहनो के हाथ भी पीले करने थे, उनकी उम्र भी निकली जा रही थी। पर करे कैसे, यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह था। आखिर माई को जाना पड़ा एक बार फिर बटुक सेठ के पास उधारी के लिए। सेठ ने पहले ना नुकुर किया, फिर यह कहते हुए उसने पच्चीस हजार रूपए दे दिए कि नैना की शादी अच्छे से होनी चाहिए।

दोनों बहनों की शादी हो गई। माई और नंदू ने राहत की सांस ली। परिवार में दोनों बहनों के खर्चे का बोझ कम तो जरूर हुआ, पर सेठ का कर्ज अलग से चढ़ गया था। नंदू परेशान था, कि एक दिन उसके पड़ोसी जोखन ने बताया,
“एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों द्वारा गाय भैंस खरीदने के लिए ऋण दिया जा रहा है। जा तू भी ले ले मेरी तरह। दूध निकाल और बेच। अच्छी आमदनी हो जाती है।”

नंदू को यह बात अच्छी लगी और जोखन से सारी बातें समझ कर वह चल पड़ा प्रखंड कार्यालय और बैंक की ओर।

प्रखंड कार्यालय में उसने बाबू से अपना प्रकरण बनवाया। पर बैंक तक पहुंचने में दो सप्ताह लग गए। अंततः ऋण स्वीकृत भी हो गया दो भैंसों के लिए। अगले गुरुवार को बाजार के दिन प्रखंड कार्यालय के बाबू, डॉक्टर साहेब और बैंक बाबू के सहयोग से उसे एक भैंस मिल गई।

नंदू की खुशी की कोई सीमा नहीं थी। जोखन ने सही कहा था खुद की खुशी के लिए दूसरों को पहले खुश करना चाहिए। उसने ऐसा ही किया। उसने जोखन को भी खुश किया। सबको खुश करने में काफी पैसे खर्च हो गए, पर उसे पता था कि सब की खुशी में ही अपनी खुशी है।

एक वीर योद्धा की तरह उसने अपने गांव में प्रवेश किया था, जब वह पहली भैंस को घर लाया था। माई धनिया और पत्नी सिया तैयार थी नवागंतुका के स्वागत के लिए। पूजा पाठ करने के बाद उसका नाम रखा गया ‘लछमी’, मानों वह लक्ष्मी का अवतार बन कर ही आई हो।

शुरू के एक दो दिन तो यूं ही निकल गए। लेकिन लछमी के नखरे भी कम नहीं थे, तभी तो वह दूध देती। उसके चारा पानी और रख रखाव का पूरा ध्यान सिया नहीं रख पाती थी। दूसरे दिन से माई सिया के साथ मिलकर लछमी का ध्यान रखने लगी। पर दूध दुहना और बेचना भी अपने आप में एक बडा काम था। नंदू भी फिर इसी काम में लग गया।

परिवार का नाता मजदूरी से छूटा जरूर, लेकिन उस परिवार को दुग्ध व्यवसाय का कोई ज्ञान नही था। चारा खरीदने से लेकर टीकाकरण और दूध की बिक्री सब कुछ नया था। एक बार जोखन ने इशारा भी किया था कि नंदू लछमी को उसे दे दे, और बदले में जोखन रोज उसे पांच किलो दूध का पैसा दे देगा, चारा पानी और रख रखाव उसका अपना।

एक बार नंदू को बात सही लगी, पर उस राशि से अपना पेट भरना और ऋण चुकाना कठिन था। उसने निर्णय लिया कि घर में एक बार लछमी आई है, तो उसे अब अपने साथ ही रखेगा और उसकी सेवा भी करेगा। चारा पानी लाने और दूध बेचने का काम नंदू करने लगा और लछमी की देख भाल और दूध दुहने का काम माई और सिया के जिम्मे था।

गांव में तो दूध की कोई खपत थी नहीं। शहर में जाकर किसी हलवाई को बेचना पड़ता था, वह भी औने पौने दाम पर। वैसे गांव में ही सुधा डेयरी वाले आते थे और लैक्टोमीटर से नाप कर शुद्धतानुसार मूल्य देते थे। पर वह मूल्य बाजार भाव से बहुत कम होता था और भुगतान भी महीना खत्म होने के बाद ही मिलता था।

मजदूरी की तुलना में आमदनी में कोई ज्यादा सुधार नहीं दिख रहा था। छह महीने के बाद बैंक से जब दूसरी भैंस ‘रंभा’ मिली, तो परिवार ने राहत की सांस ली। पर उसके साथ कुछ नई समस्यायें भी आईं। एक तो मरखंडी थी वह, दूध निकालते समय लात मारती थी। आते साथ ही उसे खांसी भी हो गई। दूध भी बहुत कम देती थी।

इन समस्याओं के साथ नंदू फिर जोखन के पास गया। उसने समझाया, ‘ रंभा के अगले एक पैर को बांध दिया करो दूध निकालने से पहले। दस बीस बूंदे सरसों का तेल उसके मुंह में डाल दो, सर्दी खांसी ठीक हो जाएगी। अगर पड़वा को दूध पिलाने के बाद भी रंभा का दूध नही उतर रहा है तो शायद उसे इंजेक्शन की जरूरत है। तुम तो दुहने के पहले सिर्फ सुई चुभो कर देखो।’

नंदू ने वैसा ही किया, और वह आश्चर्यचकित था रंभा में अपेक्षित सुधार देख कर। दूध की मात्रा भी बढ़ने लगी थी। लछमी तो लेकिन लछमी थी, वह रंभा से हमेशा ज्यादा दूध देती थी। बस अब एक ही समस्या रही कि दूध को बेचे कैसे अच्छे दामों पर।

एक दिन हलवाई के दुकान से दूध बेच कर नंदू निकल ही रहा था कि एक व्यक्ति ने पूछा,
क्या तुम्हारे पास और दूध है।”
नंदू ने बताया कि वह अभी अभी सारा दूध बेचा है। उस व्यक्ति ने फिर कहा,
“तुम अगर घरों में दूध बेचना चाहो तो मेरे घर में दो किलो दे दिया करो रोज। मेरा घर नीले रंग का है वह सामने वाला।”

नंदू को यह विचार पसंद आया और दूसरे दिन से उन्हें दूध बेचने लगा, शेष हलवाई को। फिर उस व्यक्ति के अड़ोस पड़ोस में भी उसने पूछा। चूंकि वह सीधे गांव से दूध लेकर आता था, कई लोग तत्काल तैयार हो गएं और नंदू के सारे दूध की खपत शहर के घरों में होने लगी।

नंदू को अब दूध का भाव भी अच्छा मिलने लगा था हलवाई की तुलना में। नए ग्राहक भी खुश थे दूध की शुद्धता को देख कर। एक गृहिणी ने उसे बताया कि कैसे अब उसे बाजार से घी खरीदने की जरूरत ही खत्म हो गई थी।

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। जिंदगी पटरी पर आने लगी थी। घर में गैस का चूल्हा और एक छोटी टीवी आने के बाद सबकी दिनचर्या ही बदल गई थी। माई नंदू की इस काबिलियत पर फूले नहीं समा रही थी।

नंदू को बचपन में कही अपनी माई की वह बात याद आने लगी थी कि किसी का दिन एक जैसा नहीं रहता। समय का चक्र चलता रहता है। दुख के बाद सुख आता ही है। बात सही है, पर यह भी सही है कि सुख के बाद दुख भी आता है।

रंभा बीमार पड़ी और ऐसी पड़ी कि उसने खाना पीना दूध देना सब बंद कर दिया, और एक दिन वह चल बसी। राहत की बात यह थी कि राष्ट्रीय पशुधन बीमा योजना के अंतर्गत नंदू ने बैंक और डॉक्टर साहेब की सहायता से दोनो भैंसों का बीमा कराया था। रंभा के कान वाला टैग लेकर नंदू बैंक गया और मुआवजे का फॉर्म भर दिया। जैसा जैसा लोगों ने बताया, वह करता गया।

किंतु कोई लाभ नहीं हुआ। काफी भाग दौड़ के बावजूद उसे न कोई मुआवजा मिला और ना ही दूसरी भैंस। बीमा कंपनी ने ऐसी शर्तें रख दीं, जो असंभव था पूरा कर पाना। उपभोक्ता फोरम और न्यायालय की शरण में जाने की सलाह लोग दे रहे थे, जहां पैसे और समय दोनों लगने थे। इस बीच ऋण बढ़ता रहा अपने मंथर गति से।

नंदू ने तीसरी भैंस लेने की कोशिश की, पर एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अंतर्गत दो ही भैंस देने का प्रावधान था। बैंक वालों ने तीसरी भैंस देने से मना कर दिया यह कहते हुए कि दो से ज्यादा भैंसें लेने के लिए उसके पास अपनी कोई भूमि होनी चाहिए गिरवी रखने के लिए।

दूध कम होने के साथ आमदनी भी कम होने लगी थी। ग्राहक भी कम होने लगे थे। अब तो बस लछमी का ही साया रहा उनके ऊपर। लछ्मी फिर अकेली हो गई थी। घर में पहले आई थी, और इसलिए उसे शायद अपनी जिम्मेदारी का अहसास था। उसने अपने परिवार का साथ बखूबी निभाया भी।

पर समय के सामने कहीं कोई टिक पाया है? परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। उम्र के साथ उसके शरीर में परिवर्तन स्पष्ट दिखने लगे थे। दूध भी बहुत कम हो गया था, जिससे परिवार का गुजारा संभव नहीं था। ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाने का भी कोई लाभ नहीं हो पाया।

नंदू एक बार फिर जोखन के पास गया। लछमी को उसने जोखन के हवाले कर दिया। अब लछमी जोखन की हो गई थी, साथ ही माई भी जोखन के तबेले में मजदूरी करने लगी थी, क्योंकि उसे अच्छा खासा अनुभव हो गया था पशुपालन का, और संभवतः इसलिए भी कि माई अपनी लछमी से विलग नहीं रहना चाहती थी। सिया खेतों में मजदूरी करने लगी और बेचारा नंदू फिर जाने लगा पहाड़ की ओर पत्थर तोड़ने, बैंक और सेठ दोनों का बकाया जो अभी चुकाया जाना बाकी था।

image: pinterest

–कौशल किशोर

8 Comments

    1. आपको कहानी अच्छी लगी, जान कर खुशी हुई। बहुत बहुत धन्यवाद 😊

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      1. आपके शब्दों से मैं अभिभूत हूं। बहुत बहुत आभार आपका।

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    1. यह कहानी मेरे दिल के बहुत करीब है। यह सच्ची कहानी तो नही, पर सच्ची घटनाओं पर आधारित है। पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद 😊💐💖

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